छोटे एवं मझोले निर्यातकों को डिजाइन की हेरा फेरी व रेट के कम्पटीशन नही दे रही है उबरने

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भदोही। एक तो भारत सरकार द्वारा कोई सुविधा न मिलना ऊपर से डिजाइन हेरा फेरी व रेट की कम्पटीशन ने छोटे एवं मझोले निर्यातकों को कमर झुका दी जबकि छोटे एवं मझोले निर्यातकों से ही मार्केट में आती है बहार तथा गरीब बुनकर सभी को मिलता है काम। उक्त बातें कई निर्यातकों से चर्चा के दौरान उभर कर सामने आई। छोटे एवं मझोले निर्यातकों का कहना है कि अगर हम लोग किसी भी ग्राहकों से काम करते है तो कुछ बड़े निर्यातक उन ग्राहकों से 10 सेंट या 5 सेंट कम कर आर्डर को ले लेते है या तो फिर उन ग्राहकों से यह भी कह दिया जाता है कि छोटे एवं मझोले निर्यातक टीन शेड में काम करते है उनके पास कोई ऐसी सुविधा नही है जिससे कालीन अच्छे एवं आकर्षक बना कर दे सकें। और वे लोग क्वांटिटी में भी कालीन को तैयार नही करा सकते। उन निर्यातकों का कहना रहा कि हम लोग दिन रात एक करके अच्छे व सुंदर डिजाइन में कालीन तैयार करते है और उसे जब एक्जीबिशन में ले जाकर अपने स्टालों पर प्रदर्शित करते है तो वहां से डिजाइन की हेरा-फेरी होती है और उसी डिजाइन को कम दामो में ग्राहकों के सामने प्रदर्शित कर आर्डर ले लेते है जिससे कि छोटे एवंम मझोले निर्यातकों का मनोबल टूट जाता है। अगर यही हाल रहा तो निर्यातकों के लिस्ट से छोटे एवं मझोले निर्यातक खत्म हो जाएंगे और मार्केट इसी तरह से मंदी की मार को झेलता रहेगा। कहा गया कि सबसे बड़ी समस्या डिजाइन की हेरा फेरी व रेट कम्पटीशन है अगर यह खत्म हो जाए तो भदोही का चाहे बड़ा निर्यातक हो या फिर छोटे एवं मझोले निर्यातक सभी के पास आर्डर होगा और रेट भी होगा। अगर ऐसा होता है तो मार्केट में एक बार फिर से बहार आ सकती है।


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